दुनिया की सबसे ऊंची चोटी, माउंट एवरेस्ट, न केवल पर्वतारोहियों के साहस की परीक्षा लेती है, बल्कि अब यह बड़े वित्तीय घोटालों का केंद्र भी बन गई है। हालिया जांच में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है जिसे ‘एवरेस्ट रेस्क्यू स्कैम’ कहा जा रहा है। अनुमान है कि यह घोटाला लगभग $20 मिलियन (करीब 160 करोड़ रुपये) से अधिक का है।
क्या है यह पूरा मामला?
यह घोटाला मुख्य रूप से बीमा धोखाधड़ी (Insurance Fraud) पर आधारित है। इसमें ट्रेकिंग कंपनियों, हेलिकॉप्टर ऑपरेटरों और अस्पतालों का एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा है। जब भी कोई विदेशी पर्यटक या पर्वतारोही नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में थोड़ी सी भी अस्वस्थता महसूस करता है, तो उसे तुरंत ‘इमरजेंसी रेस्क्यू’ के नाम पर हेलिकॉप्टर से एयरलिफ्ट कर लिया जाता है।
घोटाले का ‘मोडस ऑपेरंडी’ (काम करने का तरीका)
जांच रिपोर्टों के अनुसार, यह स्कैम कई स्तरों पर फैला हुआ है:
- अनावश्यक रेस्क्यू: गाइड अक्सर पर्यटकों को डराते हैं कि उनकी तबीयत ज्यादा खराब है और उन्हें तुरंत नीचे ले जाने की जरूरत है, भले ही उन्हें केवल मामूली सिरदर्द या थकान हो।
- फर्जी बिलिंग: $2,000 की हेलिकॉप्टर उड़ान के लिए बीमा कंपनियों से $10,000 से $15,000 तक वसूले जाते हैं।
- अस्पताल की मिलीभगत: पर्यटकों को ऐसे अस्पतालों में ले जाया जाता है जो इस नेटवर्क का हिस्सा होते हैं। वहां उन्हें अनावश्यक टेस्ट और इलाज के नाम पर लंबे समय तक रखा जाता है ताकि बिल को और बढ़ाया जा सके।
- कमीशन का खेल: हेलिकॉप्टर कंपनियों और अस्पतालों से मिलने वाला मोटा कमीशन गाइड और ट्रेकिंग एजेंसियों के बीच बांटा जाता है।
टेक और डेटा का दुरुपयोग
इस घोटाले में तकनीक का भी गलत इस्तेमाल देखा गया है। बीमा दावों को पुख्ता करने के लिए डिजिटल मेडिकल रिपोर्ट में छेड़छाड़ की जाती है। साथ ही, सैटेलाइट फोन और जीपीएस डेटा का उपयोग करके ऐसी उड़ानें दिखाई जाती हैं जो असल में कभी हुई ही नहीं थीं।
इसका पर्यटन पर प्रभाव
इस बड़े खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनियों ने नेपाल को ‘हाई रिस्क’ श्रेणी में डाल दिया है। कई कंपनियों ने तो पर्वतारोहियों का बीमा करने से ही मना कर दिया है। यदि यह स्कैम नहीं रुका, तो नेपाल के पर्यटन उद्योग और एवरेस्ट की साख को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।
