डॉक्टरों और दवा कंपनियों का खेल: 100 रुपये की दवा 1000 रुपये में बेचना, कमीशन का ऐसा जाल कि मरीज बन जाता है गुलाम
कैसे डॉक्टर तय करते हैं कि कौन सी दवा लिखनी है, कंपनियाँ क्यों देती हैं महंगे गिफ्ट और विदेशी टूर – जानिए पूरा सच
नई दिल्ली: जब भी हम बीमार पड़ते हैं, तो डॉक्टर के पास जाते हैं। वो जो दवा लिखते हैं, वही हम खरीदते हैं। कभी सवाल नहीं करते कि यह दवा क्यों लिखी, इसका कोई सस्ता विकल्प है या नहीं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि डॉक्टर और दवा कंपनियों के बीच एक बड़ी साँठ-गाँठ है, जिसकी वजह से दवाइयाँ महंगी हो जाती हैं और मरीज लुट जाता है?
हर साल भारत में दवाइयों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होते हैं। इसमें से एक बड़ा हिस्सा उन दवाओं पर खर्च होता है जो ब्रांडेड हैं, जबकि उनके सस्ते जेनेरिक वर्जन मौजूद हैं। डॉक्टर जानबूझकर महंगी दवाएँ लिखते हैं, क्योंकि दवा कंपनियाँ उन्हें इसके बदले कमीशन, महंगे गिफ्ट, विदेशी टूर, और बड़े-बड़े कॉन्फ्रेंस में बुलाती हैं।
आज हम इसी साँठ-गाँठ के बारे में विस्तार से बात करेंगे – कैसे यह खेल चलता है, कौन-कौन से तरीके अपनाए जाते हैं, और आप इस जाल में फंसने से कैसे बच सकते हैं।
अध्याय 1: डॉक्टर और दवा कंपनियों की साँठ-गाँठ क्या है?
डॉक्टर और दवा कंपनियों के बीच का रिश्ता सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं है। यह एक बड़ा कारोबार है। दवा कंपनियाँ चाहती हैं कि डॉक्टर उनकी ब्रांडेड दवाएँ लिखें। इसके बदले वे डॉक्टरों को कमीशन, गिफ्ट, विदेश यात्रा, मेडिकल कॉन्फ्रेंस, और दूसरे फायदे देती हैं।
यह सब कुछ कानूनन गलत है। भारत मेडिकल काउंसिल (MCI) के नियमों के मुताबिक, डॉक्टरों को दवा कंपनियों से कोई भी गिफ्ट या कमीशन लेना मना है। लेकिन यह खेल चुपके-चुपके चलता रहता है।
यह साँठ-गाँठ कैसे काम करती है?
| कंपनी क्या देती है | डॉक्टर क्या करता है |
|---|---|
| कमीशन (प्रति पर्ची) | उसी कंपनी की महंगी दवा लिखता है |
| विदेशी टूर | दूसरी कंपनियों की दवा नहीं लिखता |
| महंगे गिफ्ट (घड़ी, फोन, लैपटॉप) | जेनेरिक दवा की जगह ब्रांडेड दवा लिखता है |
| कॉन्फ्रेंस में बुलाना | मरीज को सस्ते विकल्प के बारे में नहीं बताता |
| क्लिनिक का खर्चा उठाना | जरूरत से ज्यादा दवाएँ लिखता है |
अध्याय 2: ब्रांडेड दवा और जेनेरिक दवा में क्या फर्क?
समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि ब्रांडेड दवा और जेनेरिक दवा में क्या फर्क होता है।
ब्रांडेड दवा:
- कोई दवा कंपनी पहले बनाती है, उसका पेटेंट लेती है, और उसे अपना ब्रांड नाम देती है।
- यह महंगी होती है क्योंकि कंपनी ने रिसर्च में पैसा लगाया होता है।
- उदाहरण: Crocin (पैरासिटामोल का ब्रांड नाम)
जेनेरिक दवा:
- जब पेटेंट खत्म हो जाता है, तो दूसरी कंपनियाँ भी वही दवा बना सकती हैं।
- यह उतनी ही असरदार होती है, लेकिन कीमत 50-80% कम होती है।
- उदाहरण: पैरासिटामोल (किसी भी कंपनी की, सिर्फ साल्ट नाम से)
कीमत का फर्क:
| दवा | ब्रांडेड कीमत | जेनेरिक कीमत |
|---|---|---|
| पैरासिटामोल (500mg) | 50-80 रुपये (10 टैबलेट) | 10-15 रुपये (10 टैबलेट) |
| एंटीबायोटिक | 200-500 रुपये | 50-150 रुपये |
| बीपी की दवा | 100-200 रुपये (महीना) | 20-50 रुपये (महीना) |
| शुगर की दवा | 150-300 रुपये (महीना) | 30-80 रुपये (महीना) |
यानी ब्रांडेड दवा पर मरीज को 3-5 गुना ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
अध्याय 3: डॉक्टरों को कैसे मिलता है कमीशन? – पूरा खेल
दवा कंपनियाँ डॉक्टरों को कमीशन देने के लिए कई तरीके अपनाती हैं। ये तरीके इतने चालाकी से बनाए गए हैं कि बाहर से देखने में कुछ गलत नहीं लगता।
तरीका 1: पर्ची के हिसाब से कमीशन
यह सबसे पुराना और सबसे आम तरीका है। दवा कंपनी का सेल्समैन (मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव) डॉक्टर के पास आता है। वह बताता है कि उनकी कंपनी की दवा लिखने पर डॉक्टर को हर पर्ची पर 10-20% कमीशन मिलेगा। जितनी ज्यादा दवा लिखेंगे, उतना ज्यादा कमीशन।
तरीका 2: विदेशी टूर और कॉन्फ्रेंस
दवा कंपनियाँ डॉक्टरों को विदेशी टूर पर ले जाती हैं। नाम पर “मेडिकल कॉन्फ्रेंस” होता है, लेकिन असल में यह 5-7 दिन का घूमने का प्रोग्राम होता है। कंपनी हवाई टिकट, 5 सितारा होटल, और दूसरे खर्चे उठाती है। बदले में डॉक्टर उनकी दवाएँ लिखने का वादा करता है।
तरीका 3: महंगे गिफ्ट
कंपनियाँ डॉक्टरों को महंगी घड़ियाँ, लैपटॉप, मोबाइल फोन, पेन, डायरी, और यहाँ तक कि कार तक गिफ्ट करती हैं। यह सब “प्रमोशनल मटेरियल” के नाम पर दिया जाता है, लेकिन असल में यह रिश्वत होती है।
तरीका 4: क्लिनिक का खर्चा उठाना
कई बार कंपनियाँ डॉक्टर के क्लिनिक का खर्चा भी उठाती हैं – बिजली का बिल, कर्मचारियों की सैलरी, यहाँ तक कि क्लिनिक की सजावट तक। बदले में डॉक्टर उनकी दवाएँ लिखता है।
तरीका 5: रिसर्च पेपर का झांसा
कंपनियाँ डॉक्टरों के नाम पर रिसर्च पेपर प्रकाशित करवाती हैं। डॉक्टर को लगता है कि उसकी प्रतिष्ठा बढ़ रही है, लेकिन असल में कंपनी उससे दवा लिखवाने का सौदा कर लेती है।
अध्याय 4: इस साँठ-गाँठ का सबसे बड़ा नुकसान किसे होता है?
इस खेल का सबसे बड़ा नुकसान आम मरीज को होता है। आइए समझते हैं कैसे:
नुकसान 1: महंगी दवा खरीदनी पड़ती है
जब डॉक्टर ब्रांडेड दवा लिखता है, तो मरीज को उसी दवा के जेनेरिक वर्जन से 3-5 गुना ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। एक मरीज अगर पूरी जिंदगी बीपी या शुगर की दवा लेता है, तो उसे हर महीने 200-300 रुपये की जगह 1000-1500 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
नुकसान 2: जरूरत से ज्यादा दवाएँ
कई डॉक्टर जरूरत से ज्यादा दवाएँ लिखते हैं – एंटीबायोटिक जहाँ जरूरी न हो, विटामिन की गोलियाँ जहाँ जरूरत न हो, और दूसरी महंगी दवाएँ। इससे मरीज का बिल बढ़ता है और कई बार दवाओं के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं।
नुकसान 3: जेनेरिक दवा के बारे में जानकारी नहीं मिलती
डॉक्टर मरीज को यह नहीं बताते कि इस दवा का सस्ता जेनेरिक वर्जन भी मौजूद है। मरीज को लगता है कि ब्रांडेड दवा ही असरदार है, जबकि असल में दोनों में कोई फर्क नहीं होता।
नुकसान 4: गरीब मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित
गरीब मरीज जो महंगी दवा नहीं खरीद सकते, वे या तो दवा छोड़ देते हैं या फिर आधी खुराक लेते हैं। इससे उनकी बीमारी बढ़ जाती है और उन्हें और ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
अध्याय 5: क्या कहते हैं नियम और कानून?
भारत में डॉक्टरों को दवा कंपनियों से कमीशन लेने से रोकने के लिए कई नियम बनाए गए हैं।
भारत मेडिकल काउंसिल (MCI) के नियम:
- डॉक्टर दवा कंपनियों से कोई भी गिफ्ट नहीं ले सकते।
- डॉक्टर दवा कंपनियों के विदेशी टूर पर नहीं जा सकते।
- डॉक्टर कमीशन के बदले कोई खास दवा नहीं लिख सकते।
- अगर कोई डॉक्टर इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है।
नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के नियम:
2020 में MCI की जगह NMC आया। नए नियमों में भी डॉक्टरों को दवा कंपनियों से कोई भी फायदा लेने से मना किया गया है। उल्लंघन पर 5 लाख रुपये तक का जुर्माना और रजिस्ट्रेशन रद्द हो सकता है।
लेकिन असलियत क्या है?
नियम तो सख्त हैं, लेकिन लागू नहीं होते। हर साल हजारों डॉक्टर विदेशी टूर पर जाते हैं, लाखों रुपये का कमीशन लेते हैं, लेकिन किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। क्योंकि यह खेल चुपके-चुपके चलता है और पकड़ना मुश्किल है।
अध्याय 6: कैसे बचें इस जाल से? – 5 जरूरी टिप्स
अगर आप डॉक्टरों और दवा कंपनियों के इस जाल में फंसने से बचना चाहते हैं, तो ये 5 टिप्स आपके बहुत काम आएंगे।
टिप 1: जेनेरिक दवा माँगें
डॉक्टर जो दवा लिखे, उसका जेनेरिक नाम (साल्ट नाम) पूछें। कहें – “डॉक्टर साहब, इस दवा का जेनेरिक नाम क्या है?” जेनेरिक नाम पता होने पर आप किसी भी मेडिकल स्टोर से सस्ती दवा ले सकते हैं।
टिप 2: प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र से लें दवा
सरकार ने देश भर में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र खोले हैं। यहाँ जेनेरिक दवाएँ ब्रांडेड दवाओं से 50-80% सस्ती मिलती हैं। अगर आपके शहर में ऐसा केंद्र है, तो वहाँ से दवा लें।
टिप 3: डॉक्टर से साफ-साफ पूछें
डॉक्टर से पूछें – “क्या इस दवा का कोई सस्ता विकल्प है?” एक अच्छा डॉक्टर इस सवाल का जवाब देगा। अगर डॉक्टर नाराज हो जाता है या टालता है, तो समझ जाइए कि वह कमीशन ले रहा है।
टिप 4: ब्रांडेड दवा के चक्कर में न पड़ें
कई बार मेडिकल स्टोर वाले भी कहते हैं – “यह दवा अच्छी है, यही ले लो।” लेकिन आप जेनेरिक दवा पर जोर दें। अगर मेडिकल स्टोर वाला जेनेरिक दवा नहीं दे रहा, तो दूसरे स्टोर पर चले जाएँ।
टिप 5: सरकारी अस्पताल से राय लें
अगर किसी बड़ी बीमारी के लिए लंबे समय तक दवा लेनी है, तो किसी सरकारी अस्पताल (AIIMS, PGI, RML) में जाकर राय लें। सरकारी डॉक्टरों को कमीशन का कोई फायदा नहीं होता, इसलिए वे ज्यादा ईमानदारी से दवा लिखते हैं।
अध्याय 7: कुछ ऐसे केस जो आपको हैरान कर देंगे
केस 1: 100 रुपये की दवा 1000 रुपये में बेची गई
दिल्ली के एक मरीज को डॉक्टर ने 1000 रुपये की दवा लिखी। मरीज ने जेनेरिक दवा की जानकारी ली तो पता चला कि उसी दवा का जेनेरिक वर्जन सिर्फ 100 रुपये में मिल रहा था। उसने जेनेरिक दवा ली और 900 रुपये बचाए।
केस 2: डॉक्टर को मिला विदेशी टूर का लालच
मुंबई के एक डॉक्टर ने खुद बताया कि उन्हें दवा कंपनी ने थाईलैंड टूर पर बुलाया। वहाँ 5 दिन के प्रोग्राम में सिर्फ एक दिन कॉन्फ्रेंस था, बाकी 4 दिन घूमना था। बदले में डॉक्टर ने उस कंपनी की दवाएँ लिखना शुरू कर दिया।
केस 3: 10 साल तक महंगी दवा ली
लखनऊ के एक शुगर के मरीज को डॉक्टर ने एक ब्रांडेड दवा लिख दी। वह 10 साल तक वही दवा लेता रहा। एक दिन उसने जेनेरिक दवा के बारे में पूछा तो पता चला कि वही दवा 80% सस्ती मिल रही थी। 10 साल में उसने लाखों रुपये बेवजह खर्च कर दिए।
निष्कर्ष: जागरूकता ही बचाव है
डॉक्टर और दवा कंपनियों की साँठ-गाँठ कोई नई बात नहीं है। यह सालों से चल रहा है। लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान आम मरीज को होता है। मरीज जागरूक नहीं है, इसलिए डॉक्टर जो कहते हैं, वही सही मान लिया जाता है। कभी सवाल नहीं करते।
याद रखें:
- हर ब्रांडेड दवा का एक सस्ता जेनेरिक वर्जन होता है
- जेनेरिक दवा उतनी ही असरदार होती है
- डॉक्टर से सवाल पूछने में कोई शर्म नहीं
- प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र से दवा लें
- दूसरी राय लेने में कोई हर्ज नहीं
डॉक्टर और दवा कंपनियों का यह खेल तभी खत्म होगा जब मरीज जागरूक होंगे। जब मरीज सवाल पूछेंगे, जब वे जेनेरिक दवा माँगेंगे, तब डॉक्टरों को एहसास होगा कि अब यह खेल नहीं चलेगा।
आपका पैसा आपकी मेहनत की कमाई है। इसे बेवजह महंगी दवाओं पर खर्च न होने दें। जागरूक बनें, सवाल पूछें, और सस्ती दवा लें।
लेखक: इन्फोविजन मीडिया हेल्थ डेस्क
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