तेहरान/जेरूसलम: 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमले किए, तो यह लड़ाई अचानक नहीं शुरू हुई। यह उस दुश्मनी की चरम सीमा है, जो करीब 50 साल पहले शुरू हुई थी ।
लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि ईरान और इजराइल कभी करीबी दोस्त हुआ करते थे। उनके बीच तेल का कारोबार होता था, खुफिया जानकारियाँ साझा होती थीं, और दोनों एक-दूसरे के सहयोगी थे ।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि दोस्त बदतरीन दुश्मन बन गए? आइए समझते हैं इस सवाल का पूरा जवाब – इतिहास से लेकर आज तक, और आगे क्या हो सकता है।
अध्याय 1: वो ज़माना जब ईरान और इजराइल थे दोस्त (1948-1979)
ईरान ने सबसे पहले दी थी इजराइल को मान्यता
जब 1948 में इजराइल देश बना, तो अरब देशों ने उसका विरोध किया और जंग छिड़ गई । लेकिन ईरान ने इस जंग में हिस्सा नहीं लिया। तुर्की के बाद ईरान दूसरा मुस्लिम देश था, जिसने इजराइल को मान्यता दी ।
क्यों थे दोनों दोस्त?
उस समय ईरान पर शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का राज था। वे अमेरिका के करीबी सहयोगी थे और पश्चिमी देशों से उनके अच्छे संबंध थे । इजराइल भी अमेरिका का करीबी दोस्त था। यानी दोनों के साझा दोस्त थे – अमेरिका और पश्चिमी देश।
इजराइल ने उस समय एक खास नीति बनाई थी, जिसके तहत वह उन गैर-अरब देशों से दोस्ती करना चाहता था जो उसके आसपास थे – जैसे ईरान और तुर्की । क्योंकि अरब देशों से उसके रिश्ते खराब थे, इसलिए उसे दूसरे दोस्तों की जरूरत थी ।
कैसी थी उनकी दोस्ती?
दोनों देशों के बीच खूब कारोबार होता था। अरब देशों ने इजराइल का तेल बहिष्कार कर रखा था, लेकिन ईरान इजराइल को तेल बेचता था । इसके अलावा, दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारियाँ साझा होती थीं, सैन्य सहयोग था, और खेती की तकनीक का आदान-प्रदान होता था ।
1970 के दशक में जब ईरान और इराक के बीच झगड़ा चल रहा था, तो इजराइल ने ईरान की मदद भी की थी ।
यानी करीब 30 साल तक दोनों देशों के बीच बहुत अच्छे संबंध थे।
अध्याय 2: 1979 – वो साल जब सब कुछ बदल गया
इस्लामी क्रांति और ख़ुमैनी का आना
1979 में ईरान में बड़ा बदलाव हुआ। शाह को सत्ता से हटा दिया गया और अयातुल्ला रूहोल्लाह ख़ुमैनी देश के नेता बने। यह बदलाव सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि पूरी सोच बदल गई ।
ईरान अब एक इस्लामी देश बन गया। नई सरकार ने पश्चिमी देशों से दूरी बनानी शुरू की और अमेरिका को “बड़ा शैतान” करार दिया ।
क्या बदल गया?
नए नेता ख़ुमैनी की नज़र में इजराइल अब कोई दोस्त नहीं था। उन्होंने इजराइल को “छोटा शैतान” कहा और उसे फ़लस्तीनी ज़मीन पर कब्ज़ा करने वाला देश बताया ।
ईरान ने तुरंत इजराइल से सारे संबंध तोड़ दिए । अब “इज़राइल का खात्मा” करना ईरान की राजनीति का हिस्सा बन गया ।
क्यों इतनी नफरत?
इस बदलाव के पीछे कुछ बड़ी वजहें थीं:
- धार्मिक सोच: ख़ुमैनी का मानना था कि मुस्लिम देशों का नेता ईरान होना चाहिए और इजराइल उस रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट है ।
- फ़लस्तीन मुद्दा: ईरान ने फ़लस्तीनियों के हक की लड़ाई को अपना मुद्दा बना लिया। इजराइल को वो फ़लस्तीनी ज़मीन का हड़पने वाला मानने लगा ।
- अमेरिका से दुश्मनी: अमेरिका और इजराइल करीबी दोस्त थे, इसलिए अमेरिका के दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त नहीं हो सकता था ।
अध्याय 3: छिपी जंग – दुश्मनी के 40 साल (1980-2023)
दोस्ती टूटने के बाद दोनों देशों ने सीधी जंग तो नहीं छेड़ी, लेकिन दुश्मनी जारी रही। यह वो दौर था जब जंग छिपी हुई थी – किसी पर आरोप लगता था, लेकिन कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता था ।
ईरान की तरफ से: दूसरों के हाथों लड़ाई
ईरान ने इजराइल से लड़ने के लिए कई गुटों को हथियार और पैसे देने शुरू किए :
- हिज़्बुल्लाह (लेबनान): 1982 में बनाया गया, जो आज तक इजराइल के लिए बड़ा ख़तरा है ।
- हमास (फ़लस्तीन): गाजा पट्टी में ताकतवर गुट, जिसने 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल पर बड़ा हमला किया ।
- हौथी (यमन): यमन के ये विद्रोही भी ईरान के सहयोगी हैं ।
इजराइल की तरफ से: चुपके से हमले
इजराइल भी चुपके-चुपके ईरान को नुकसान पहुँचाता रहा :
- परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या: ईरान के कई बड़े परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या हुई, जिसका ठीकरा इजराइल पर लगा ।
- साइबर हमले (2010): अमेरिका और इजराइल ने मिलकर एक कंप्यूटर वायरस बनाया, जिसने ईरान के परमाणु संयंत्रों को बड़ा नुकसान पहुँचाया।
- सीरिया में हमले: ईरान के सीरिया में ठिकानों पर इजराइल हवाई हमले करता रहा ।
परमाणु बम का डर
2002 में पता चला कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार बनाने का काम कर रहा है । इजराइल के लिए यह सबसे बड़ा ख़तरा था। इजराइल ने हमेशा यह साफ कहा कि वह ईरान को परमाणु हथियार बनाने की इजाजत नहीं देगा ।
इसी डर ने आगे चलकर जंग को जन्म दिया।
अध्याय 4: खुली जंग की शुरुआत (2023-2026)
7 अक्टूबर 2023 – वो दिन जिसने सब कुछ बदल दिया
7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजराइल पर बड़ा हमला किया। बड़ी संख्या में लोग मारे गए और कई बंधक बनाए गए । इजराइल ने हमास के खिलाफ जंग शुरू की, लेकिन यह जंग धीरे-धीरे ईरान तक पहुँच गई ।
ईरान हमास का सबसे बड़ा समर्थक था, इसलिए इजराइल का गुस्सा ईरान पर भी था ।
2024 – पहली बार सीधा टकराव
अप्रैल 2024 में पहली बार दोनों देशों के बीच सीधी जंग हुई। इजराइल ने ईरान के सीरिया में दूतावास पर हमला किया, जिसमें ईरान के जनरल मारे गए । इसके जवाब में ईरान ने इजराइल पर सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे ।
यह पहला मौका था जब दोनों देश सीधे युद्ध में भिड़े। पहले तो दूसरों के हाथों लड़ाई होती थी ।
2025 – बड़े हमले और बढ़ता तनाव
जून 2025 में इजराइल ने एक बड़े सैन्य अभियान के तहत ईरान पर हवाई हमले किए । ईरान के परमाणु संयंत्र, सैन्य ठिकाने और ऊर्जा संसाधन निशाने पर आए। कई बड़े जनरल और वैज्ञानिक मारे गए ।
28 फरवरी 2026 – जंग का पूरा विस्फोट
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने मिलकर एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया । ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई बड़े सैन्य अधिकारी मारे गए ।
ईरान ने जवाबी हमले किए। उसने इजराइल, UAE, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत और क़तर पर मिसाइलें और ड्रोन दागे । यह जंग अब सिर्फ ईरान-इजराइल के बीच नहीं, बल्कि पूरे इलाके की जंग बन गई है ।
अध्याय 5: आज क्या है? – वर्तमान स्थिति (मार्च 2026)
नेतृत्व में बदलाव
अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने नया सर्वोच्च नेता बनाया – मोजतबा खामेनेई, जो अली खामेनेई के बेटे हैं । यह बदलाव बताता है कि ईरान की कड़ी नीतियाँ जारी रहेंगी ।
जंग का असर खाड़ी देशों पर
दिलचस्प बात यह है कि ईरान के ज्यादातर हमले इजराइल पर नहीं, बल्कि खाड़ी देशों (GCC) पर हुए हैं। जानकारों के मुताबिक, ईरान के ज्यादा हमले खाड़ी देशों पर हुए और कम हमले इजराइल पर । सबसे ज्यादा नुकसान UAE को हुआ है ।
बातचीत भी चल रही है, हमले भी
पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत भी हो रही है । अमेरिका ने 15 सूत्रीय योजना भेजी है, लेकिन इजराइल इससे खुश नहीं है ।
इजराइल का कहना है कि यह योजना ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर पर्याप्त रोक नहीं लगाती ।
अध्याय 6: आगे क्या होगा? – तीन संभावनाएँ
पहली: जंग और बढ़े
अगर बातचीत नहीं हुई, तो यह जंग और लंबी खिंच सकती है। ईरान के पास हिज्बुल्लाह, हमास, हौथी जैसे कई सहयोगी हैं, जो इजराइल और अमेरिकी ठिकानों पर हमले कर सकते हैं ।
दूसरी: बातचीत से हल
अगर बातचीत सफल होती है, तो युद्धविराम हो सकता है। लेकिन इजराइल की नाराजगी के कारण यह रास्ता मुश्किल है । अमेरिका को इजराइल को मनाना होगा, जो आसान नहीं लगता।
तीसरी: होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट
ईरान ने पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही रोक दी है । यह दुनिया के 20 फीसदी तेल व्यापार का रास्ता है। अगर यह बंद रहा, तो दुनिया भर में महंगाई बढ़ सकती है ।
निष्कर्ष: दोस्ती टूटी, जंग छिड़ी
ईरान और इजराइल की कहानी यह सिखाती है कि भू-राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी के बीच की रेखा कितनी पतली है।
30 साल तक दोनों दोस्त थे – तेल का कारोबार, खुफिया साझेदारी, सैन्य सहयोग। फिर 1979 में आई एक क्रांति ने पूरा खेल बदल दिया । सोच की दुश्मनी ने आकार लिया, दूसरों के हाथों लड़ाई शुरू हुई, परमाणु बम का डर बढ़ा, और आखिरकार 2026 में दोनों खुली जंग में भिड़ गए ।
आज यह जंग सिर्फ दो देशों के बीच नहीं है – इसमें अमेरिका, खाड़ी देश, यूरोप और कई और देश घिर चुके हैं । होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति रुकी हुई है, कीमतें आसमान छू रही हैं, और पूरा इलाका तनाव में है ।
अब आने वाले दिन तय करेंगे कि यह जंग और बढ़ेगी या बातचीत से हल निकलेगा। लेकिन एक बात तय है – 1948 की दोस्ती अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में रह गई है।
लेखक: इन्फोविजन मीडिया इंटरनेशनल डेस्क
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