जयपुर, 22 मार्च 2026 – जयपुर मेट्रो को राजस्थान की राजधानी के लिए एक परिवर्तनकारी परियोजना के रूप में देखा गया था। 2011 में शुरू हुई इस परियोजना को दिल्ली मेट्रो की सफलता की तर्ज पर जनता को राहत देने वाली सबसे बड़ी सौगात माना गया था . लेकिन 12 साल से अधिक समय बाद, महज 12 किलोमीटर का परिचालन, उम्मीद से कम सवारी और बढ़ता वित्तीय संकट इस सवाल को जन्म देता है कि आखिर जयपुर मेट्रो क्यों विफल हुई? आइए जानते हैं इसके 10 प्रमुख कारण।
1. गलत रूट का चुनाव: जहां जरूरत थी, वहां नहीं पहुंची मेट्रो
जयपुर मेट्रो की सबसे बड़ी कमजोरी इसके रूट का चुनाव रहा। पहले चरण में मानसरोवर से बड़ी चौपाड़ के बीच 12 किलोमीटर का यह कॉरिडोर बनाया गया। लेकिन यह रूट शहर के सबसे व्यस्त इलाकों को नहीं जोड़ता .
शहर का सबसे अधिक यातायात टोंक रोड पर है, जहां ऑफिस, कॉलेज और व्यापारिक केंद्र स्थित हैं। मेट्रो का यह रूट रामनगर, श्यामनगर जैसे कम आबादी वाले इलाकों से होकर गुजरता है, जहां दिन के समय सबसे कम टिकट बिकती हैं .
विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआत में राजनीतिक दबाव में इसी रूट को चुना गया ताकि 2013 के चुनाव से पहले परियोजना का उद्घाटन किया जा सके . स्थानीय विधायक भी मानते हैं कि शुरुआत में योजना में गलतियां की गई थीं .
2. कम सवारी: अनुमान से आधे से भी कम यात्री
जयपुर मेट्रो का औसत दैनिक रिडरशिप लगभग 50,000 यात्री है, जबकि शुरुआत में 1.20 लाख यात्रियों का अनुमान लगाया गया था . शहर की 40 लाख की आबादी के सामने यह आंकड़ा बेहद कम है .
पिछले कुछ वर्षों तक यह संख्या बहुत कम थी . यानी मेट्रो न केवल उम्मीद पर खरी उतरी, बल्कि लगातार घाटे में चल रही है। अधिकारियों का भी मानना है कि सेवा क्षेत्र होने के नाते नुकसान होना लाजमी है .
3. धीमी गति और कम फ्रिक्वेंसी: समय का संकट
जयपुर मेट्रो की एक और बड़ी समस्या इसकी धीमी गति और ट्रेनों के बीच लंबा अंतराल है। 12 किलोमीटर की दूरी तय करने में 35-40 मिनट लग जाते हैं . जबकि निजी वाहनों से यही दूरी कम समय में पूरी हो जाती है।
2013 में जब मेट्रो शुरू हुई थी, तब ट्रेनों के बीच का अंतराल काफी अधिक था . यह स्थिति अब भी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। कम फ्रिक्वेंसी के कारण यात्री मेट्रो की जगह दूसरे साधनों को प्राथमिकता देते हैं।
4. अधूरा नेटवर्क: फंसे रहे विस्तार के सपने
2011 में शुरू हुई जयपुर मेट्रो का आज भी केवल 12 किलोमीटर का नेटवर्क ही ऑपरेशनल है . जबकि अन्य शहरों में शुरू हुई मेट्रो का नेटवर्क कहीं अधिक तेजी से विस्तार पा रहा है .
फेज-2 का विस्तार वर्षों से अटका हुआ है। 2020 में डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) तैयार की गई, लेकिन यह योजना कभी पूरी नहीं हो सकी . अब एक बार फिर डीपीआर को रिवाइज किया जा रहा है .
सबसे दर्दनाक स्थिति तब देखने को मिली जब नवंबर 2024 से बड़ी चौपाड़ से ट्रांसपोर्ट नगर के बीच 2.85 किलोमीटर के विस्तार का काम ठप हो गया। महीनों से काम बंद है, और बच्चे उसी जगह पर क्रिकेट खेल रहे हैं !
5. राजनीतिक खींचतान: सत्ता परिवर्तन का खामियाजा
जयपुर मेट्रो हमेशा राजनीति की भेंट चढ़ती रही है। 2003 में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में मेट्रो का वादा किया था . 2010 में अशोक गहलोत ने इसकी आधारशिला रखी .
2015 में वसुंधरा राजे ने इसका उद्घाटन किया और इसे ऐतिहासिक दिन बताया . लेकिन जब वह विपक्ष में थीं, तो उन्होंने इस परियोजना को बेकार और घाटे का सौदा कहा था .
जब गहलोत 2018 में सत्ता में लौटे, तो उन्होंने मेट्रो को प्राथमिकता से हटाकर अन्य परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे यातायात की समस्या में कोई खास सुधार नहीं हुआ . हर सरकार ने अपनी प्राथमिकताएं बदलीं और मेट्रो इसका खामियाजा भुगतती रही।
6. वित्तीय संकट: घाटे का बोझ
जयपुर मेट्रो लगातार वित्तीय घाटे से जूझ रही है। पहले चरण पर 3,200 करोड़ रुपये खर्च हुए . अब फेज-2 के लिए 12,260 करोड़ रुपये का प्रस्ताव है .
लेकिन यह सवाल बना रहता है कि जब मौजूदा नेटवर्क ही घाटे में चल रहा है, तो इतनी बड़ी रकम लगाने का क्या औचित्य है? केंद्रीय सहायता पर निर्भर यह परियोजना लगातार फंड की कमी से जूझती रही है .
पूर्व अधिकारियों का कहना है कि नई सरकारें फंड रोक देती हैं और आधे-अधूरे प्रोजेक्ट बिना परखे ही छोड़ देती हैं .
7. लास्ट माइल कनेक्टिविटी का अभाव
जयपुर मेट्रो की एक बड़ी विफलता यह भी है कि इसे शहर की बस सेवा और ऑटो-रिक्शा से ठीक से जोड़ा नहीं जा सका .
स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि वह मानसरोवर से मेट्रो लेते हैं, लेकिन घर से स्टेशन तक पहुंचने के लिए पहले ऑटो लेना पड़ता है। उनका कहना है कि यह रूट मेट्रो के लिए सही नहीं है, क्योंकि यह पूरे शहर को नहीं जोड़ता .
शहरी विकास विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मेट्रो स्टेशन से घर या ऑफिस तक की आखिरी दूरी तय करने का साधन नहीं होगा, तब तक लोग मेट्रो का इस्तेमाल कम ही करेंगे .
8. बार-बार बदलते अधिकारी और प्रबंधन अस्थिरता
जयपुर मेट्रो में पिछले कुछ वर्षों में कई बार प्रमुख बदले गए . प्रबंधन में लगातार बदलाव से नीतिगत स्थिरता प्रभावित हुई और परियोजनाएं लटकती रहीं.
कर्मचारियों के बीच भी असंतोष है। 12 साल की नौकरी के बाद भी प्रमोशन से जुड़े नियम नहीं बन पाए हैं . प्रशासन ने मेट्रो कर्मचारियों को हड़ताल करने से रोकने के लिए अतिआवश्यक सेवा का आदेश जारी किया है, जिससे कर्मचारियों में नाराजगी है .
9. दिल्ली मेट्रो पर निर्भरता: ठेकेदारी का विवाद
जयपुर मेट्रो के फेज-2 के काम के लिए दिल्ली मेट्रो को जनरल कंसल्टेंसी के लिए हायर किया गया है। 14,067 करोड़ के प्रोजेक्ट में 416 करोड़ रुपये कंसलटेंसी चार्ज दिए जाएंगे .
कर्मचारियों का आरोप है कि दिल्ली मेट्रो ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह काम कर रही है और जयपुर मेट्रो पर पूरी तरह काबिज होना चाहती है . डेपुटेशन पर आए अधिकारियों को अलग से भत्ता देना पड़ता है, जिससे सरकारी कोष पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है .
10. अन्य परियोजनाओं की तरह खराब योजना का शिकार
जयपुर मेट्रो अकेली ऐसी परियोजना नहीं है जो राजस्थान में ठप या अधूरी पड़ी हो। ड्रव्यवती रिवर प्रोजेक्ट (1500 करोड़), बीआरटीएस कॉरिडोर (170 करोड़), कोचिंग हब (221 करोड़) जैसी कई परियोजनाएं या तो ठप हैं या अपने उद्देश्य में विफल रही हैं .
एक पूर्व अधिकारी के अनुसार, जयपुर मेट्रो शुरू से ही खराब योजना का शिकार रही। सिस्टम में व्यवस्थित विफलता है . सीएजी की 2018 की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि जयपुर को 2025 तक मेट्रो की जरूरत नहीं थी .
निष्कर्ष: क्या अब भी उम्मीद है?
जयपुर मेट्रो आज एक ऐसी परियोजना है जो न तो पूरी तरह विफल कही जा सकती है और न ही सफल। यह उन अधूरे सपनों की तरह है जो लगातार टलते रहे हैं .
हां, कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं। 2024 में फेज-2 के लिए डीपीआर तैयार की जा रही है और केंद्र सरकार से सहयोग मिलने की उम्मीद है . नए रूट से सीतापुरा, विद्यानगर और हवाई अड्डे जैसे व्यस्त इलाके जुड़ेंगे, जिससे रिडरशिप बढ़ने का अनुमान है .
लेकिन जब तक पिछली गलतियों से सबक नहीं लिया जाता, जब तक राजनीति को परियोजना से अलग नहीं किया जाता, और जब तक आखिरी मील कनेक्टिविटी और रूट प्लानिंग पर ठोस काम नहीं होता, तब तक जयपुर मेट्रो का सपना साकार होना मुश्किल है।
नोट: यह लेख विभिन्न समाचार स्रोतों, सरकारी रिपोर्टों और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। आंकड़े प्रकाशित रिपोर्ट्स के अनुसार हैं।
