जयपुर, 22 मार्च 2026 – एक समय था जब जयपुर में मॉल का खुलना शहर के आधुनिकीकरण का प्रतीक माना जाता था। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। कई मॉल में दुकानें खाली पड़ी हैं, फूड कोर्ट सूनी हैं, और सिर्फ सिनेमा या कुछ ब्रांडेड आउटलेट ही लोगों को खींच पाते हैं । कई शॉपिंग सेंटरों में दुकानें बंद हो चुकी हैं और अधिकांश हिस्सा खाली पड़ा है । आखिर जयपुर के मॉल इतनी मुश्किलों का सामना क्यों कर रहे हैं? आइए जानते हैं इसके 10 प्रमुख कारण।
1. किराना और पारंपरिक बाजारों की मजबूत पकड़
जयपुर में खुदरा व्यापार की रीढ़ पारंपरिक किराना स्टोर और मोहल्ले की दुकानें हैं। शहर की 40 लाख आबादी के लिए दिनचर्या अब भी इन्हीं पड़ोसी दुकानों पर केंद्रित है ।
शहर में अधिकांश दैनिक किराना खरीदारी घर से कम दूरी के भीतर होती है । ये दुकानें सिर्फ सामान बेचने का जरिया नहीं, बल्कि रिश्तों का केंद्र हैं। किराना दुकानदार ग्राहक की पसंद जानता है, जरूरत पड़ने पर क्रेडिट देता है, और बिना किसी ऐप के जल्द सामान पहुंचा देता है ।
कोविड-19 के दौरान जब बड़ी रिटेल चेन संकट में थीं, जयपुर के स्थानीय स्टोर ने व्हाट्सएप के जरिए ऑर्डर लेकर और आपस में स्टॉक शेयर करके शहर को सप्लाई दी । मॉल इस तरह का लचीलापन और भरोसा नहीं दे पाते।
2. ‘शोरूमिंग’ का बढ़ता चलन
आज का शॉपर पहले मॉल में जाकर उत्पाद देखता है, उसे टच करता है, उसके फीचर्स को समझता है—और फिर रात में उसे ऑनलाइन ऑर्डर कर देता है, क्योंकि वहां सस्ता मिल रहा है । यही ‘शोरूमिंग’ (showrooming) की प्रक्रिया है।
मॉल अब सिर्फ ‘दिखाने’ की जगह बनकर रह गए हैं, जबकि बिक्री कहीं और हो रही है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर डिस्काउंट, फ्री डिलीवरी और आसान रिटर्न जैसे फायदे मॉल की दुकानें नहीं दे सकतीं ।
3. रिटेल स्पेस में अधिक आपूर्ति, कम मांग
रियल एस्टेट विशेषज्ञों के अनुसार, जयपुर में रिटेल स्पेस (दुकानें) की तुलना में ऑफिस स्पेस ज्यादा स्थिर रिटर्न देता है । जहां ऑफिस स्पेस पर स्थिर रिटर्न मिलता है, वहीं रिटेल स्पेस पर रिटर्न तो मिलता है, लेकिन यह कहीं अधिक अनिश्चित होती है ।
रिटेल स्पेस में दुकानदार तेजी से बदलते हैं, ग्राहकों की संख्या पर निर्भरता अधिक होती है, और व्यवसाय की स्थिरता कमजोर होती है । यही कारण है कि कई मॉल में दुकानें बंद पड़ी हैं और नए निवेशक आने को तैयार नहीं हैं। जयपुर मेट्रो के कुछ स्टेशनों पर भी रिटेल स्पेस लीज के लिए कोई बोलीदाता नहीं आया ।
4. मेट्रो और पब्लिक ट्रांसपोर्ट से कनेक्टिविटी का अभाव
जयपुर मेट्रो आज भी महज 12 किलोमीटर के दायरे में सीमित है। यह शहर के व्यस्ततम इलाकों—सीतापुरा, विद्यानगर, हवाई अड्डा—से नहीं जुड़ पाई है। जब मेट्रो मॉल तक नहीं पहुंचती, तो लोग निजी वाहनों का उपयोग करते हैं, जो पार्किंग और ट्रैफिक की समस्या पैदा करता है।
मेट्रो स्टेशनों पर रिटेल स्पेस के लिए भी निवेशकों की दिलचस्पी कम है, क्योंकि मेट्रो में सवारी कम है । यह एक दुष्चक्र है—कम सवारी से निवेशक नहीं आते, और निवेश न होने से सुविधाएं नहीं बढ़तीं।
5. लास्ट माइल कनेक्टिविटी का अभाव
मॉल तक पहुंचना आधी लड़ाई है, लेकिन मॉल से घर तक पहुंचना दूसरी। जयपुर में अधिकांश मॉल के आसपास ऑटो-रिक्शा, ई-रिक्शा या सार्वजनिक बस की व्यवस्था ठीक से नहीं है।
जब घर से मॉल तक और वापस आने में समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं, तो लोग पास के किराना स्टोर या बाजार को ही प्राथमिकता देते हैं ।
6. जनसांख्यिकी और उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव
जयपुर की संस्कृति मॉल-आधारित शॉपिंग के लिए उतनी अनुकूल नहीं है जितनी मेट्रो शहरों में है। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार, छोटे शहरों में अधिकांश लोग अब भी सिर्फ ऑफलाइन शॉपिंग पसंद करते हैं । लेकिन यह ऑफलाइन शॉपिंग मॉल में नहीं, बल्कि पारंपरिक बाजारों और मुख्य सड़कों पर होती है ।
जयपुर में स्थानीय बाजार—जोहरी बाजार, बापू बाजार, एमआई रोड—आज भी शहर के सबसे व्यस्त शॉपिंग डेस्टिनेशन हैं। यहां लोग सौदेबाजी कर सकते हैं, गुणवत्ता छूकर देख सकते हैं, और सबसे बड़ी बात—यहां ‘रिश्ते’ हैं। दुकानदार पहचानता है, क्रेडिट देता है, और त्योहारों पर खास डील देता है । यह व्यक्तिगत संबंध मॉल में नहीं मिलता।
7. एंकर टेनेंट और फुटफॉल की कमी
किसी भी मॉल की सफलता के लिए बड़े एंकर टेनेंट (जैसे बड़े रिटेल स्टोर, मल्टीप्लेक्स) जरूरी होते हैं, जो लोगों को खींचते हैं। लेकिन जयपुर के कई मॉल में या तो एंकर टेनेंट ही नहीं हैं या वे भी पर्याप्त ग्राहक नहीं ला पा रहे ।
जब बड़े ब्रांड भी लोगों को नहीं खींच पाते, तो छोटी दुकानों का हाल और खराब होता है। कई मॉल में समीक्षाओं में बताया गया है कि वहां लोगों की संख्या दिन-ब-दिन घट रही है और स्टाफ का व्यवहार भी संतोषजनक नहीं है ।
8. स्थानीय बाजारों की बेहतर स्थिति
जबकि मॉल संघर्ष कर रहे हैं, जयपुर के कुछ स्थानीय बाजार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि, सभी बाजारों की स्थिति अच्छी नहीं है। कुछ विरासत बाजारों में अतिक्रमण और खराब सफाई के कारण दुकानें बंद हो गई हैं ।
लेकिन जहां बुनियादी ढांचा और सफाई दुरुस्त है, वहां पारंपरिक बाजार मॉल को टक्कर दे रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि अगर निगम ने बाजार का रखरखाव ठीक से किया, तो यह अच्छी आमदनी दे सकता है ।
9. डिजाइन और लेआउट की खामियां
कई मॉल की डिजाइन और लेआउट में बुनियादी खामियां हैं । कुछ मॉल में ऊपरी मंजिलों पर छोटी-छोटी दुकानें हैं जो मॉल को बाजार जैसा लुक देती हैं । यही कारण है कि ये मॉल फिल्मों और फूड आउटलेट्स के लिए तो जाने जाते हैं, लेकिन शॉपिंग के लिए नहीं ।
10. ऑनलाइन शॉपिंग और क्विक कॉमर्स का बढ़ता दबदबा
भारत का ई-कॉमर्स मार्केट लगातार तेजी से बढ़ रहा है । क्विक कॉमर्स ने तो स्थिति और भी तेजी से बदल दी है। अब लोग 10-15 मिनट में घर पर सामान मंगवा लेते हैं ।
जयपुर में अधिकांश शॉपर्स उन ब्रांड्स को पसंद करते हैं जिनकी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मौजूदगी है । ऑनलाइन सेल्स में तेजी आई है, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अब भी अधिकांश रिटेल सेल ऑफलाइन होती है । लेकिन यह ऑफलाइन सेल मॉल में नहीं, बल्कि पारंपरिक बाजारों और किराना स्टोर में हो रही है ।
क्या अब भी उम्मीद है?
सब कुछ निराशाजनक नहीं है। जयपुर के रिटेल सेक्टर में बदलाव की संभावनाएं भी हैं:
ओमनीचैनल रणनीति – जो ब्रांड ऑनलाइन और ऑफलाइन को जोड़ रहे हैं, वे बेहतर कर रहे हैं। कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स रिटेलर जयपुर में स्टोर पर प्रोडक्ट दिखाते हैं, फिर ऐप से ऑर्डर लेकर घर डिलीवरी करते हैं ।
शोरूमिंग को बदलना – शोरूमिंग को खतरा न समझकर अवसर बनाया जा सकता है। स्टोर को ‘अनुभव केंद्र’ में बदलना होगा, जहां लोग सिर्फ खरीदने नहीं, बल्कि अनुभव करने आएं ।
मिश्रित उपयोग विकास (Mixed-Use Development) – सिर्फ शॉपिंग के लिए नहीं, बल्कि आवासीय, कार्यालय, मनोरंजन को एक साथ लाने वाले प्रोजेक्ट्स बेहतर कर रहे हैं ।
निष्कर्ष
जयपुर के मॉल की विफलता के पीछे सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई कारण हैं—मजबूत किराना नेटवर्क, बदलता उपभोक्ता व्यवहार, ‘शोरूमिंग’ का चलन, कनेक्टिविटी की कमी, और पारंपरिक बाजारों की मजबूत पकड़।
मॉल तब तक सफल नहीं होंगे, जब तक वे सिर्फ ‘शॉपिंग डेस्टिनेशन’ बने रहेंगे। जयपुर के लोग रिश्तों पर भरोसा करते हैं, सुविधा चाहते हैं, और पारंपरिक बाजारों में सौदेबाजी का मजा लेना पसंद करते हैं। मॉल को इन सभी को ध्यान में रखते हुए खुद को फिर से खोजना होगा—अनुभव केंद्र, सामुदायिक स्थल, और ओमनीचैनल रणनीति के साथ।
जैसा कि एक रिटेल विशेषज्ञ ने कहा, जयपुर के रिटेल का भविष्य पड़ोस की दुकानों को बदलने में नहीं, बल्कि उन्हें फिर से कल्पना करने में है—सामुदायिक वाणिज्य के दिल को बनाए रखते हुए आधुनिक रिटेल की दक्षता को अपनाना ।
नोट: यह लेख विभिन्न समाचार स्रोतों, रियल एस्टेट रिपोर्ट्स, और उपभोक्ता व्यवहार सर्वेक्षणों पर आधारित है।
