नई दिल्ली, 22 मार्च 2026 – हर साल 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। इस साल की थीम है – ‘Yes! We can end TB!’ यानी ‘हाँ! हम टीबी खत्म कर सकते हैं!’ . यह नारा उम्मीद और जोश भरने वाला है, लेकिन सवाल यह है कि क्या टीबी से लड़ाई का हमारा तरीका अभी भी उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है, जबकि बीमारी ने नए रूप ले लिए हैं?
भारत दुनिया में टीबी का सबसे बड़ा बोझ वहन करने वाला देश है . यहाँ हर साल लाखों नए मामले सामने आते हैं। पिछले एक दशक में सरकार ने मुफ्त इलाज, डिजिटल ट्रैकिंग और पोषण सहायता जैसे कई कदम उठाए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बीमारी की प्रकृति बदल चुकी है, जबकि हमारी रणनीति अभी भी पुरानी सोच पर आधारित है .
1. अब सिर्फ फेफड़े नहीं, शरीर का कोई भी अंग हो सकता है शिकार
टीबी को आमतौर पर फेफड़ों की बीमारी समझा जाता है, लेकिन अब यह धारणा बदलनी चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि भारत में टीबी के कुल मामलों में से 20 प्रतिशत से अधिक एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी (EPTB) के होते हैं, यानी ऐसी टीबी जो फेफड़ों के अलावा शरीर के अन्य हिस्सों—हड्डियों, मस्तिष्क, लसीका तंत्र—को प्रभावित करती है .
समस्या यह है कि हमारे ज्यादातर टेस्ट अभी भी थूक (स्पूटम) के नमूनों पर आधारित हैं, जो ईपीटीबी के मामलों में अक्सर सही परिणाम नहीं दे पाते। इससे मरीजों का निदान देरी से होता है और बीमारी गंभीर रूप ले लेती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अब नए टेस्ट के लिए ऐसे मानक जारी किए हैं, जिसमें थूक के बिना आधारित डायग्नोस्टिक्स पर जोर दिया गया है . यानी खून के नमूने से टीबी का पता लगाने वाले टेस्ट की जरूरत है। भारत में हुए एक संयुक्त अध्ययन में पाया गया कि कुछ बायोमार्कर टीबी के निदान में बेहद सटीकता दिखा सकते हैं . यानी तकनीक मौजूद है, लेकिन इसे जमीनी स्तर पर लाने की गति धीमी है.
2. जलवायु परिवर्तन: टीबी का नया सहयोगी?
पिछले साल WHO ने पहली बार जलवायु परिवर्तन और टीबी के बीच संबंधों पर विश्लेषण रिपोर्ट जारी की . यह टीबी केयर में एक नए युग की शुरुआत है. अब तक हम टीबी को गरीबी, कुपोषण और भीड़भाड़ से जोड़कर देखते थे, लेकिन जलवायु परिवर्तन इस समीकरण में नया आयाम जोड़ रहा है.
बढ़ता तापमान लोगों को घरों के अंदर रहने को मजबूर कर रहा है, जिससे इनडोर वायु प्रदूषण और संक्रमण का खतरा बढ़ता है . वहीं, बाढ़ और चक्रवात जैसी आपदाओं से विस्थापित होने वाले लोगों में टीबी के बढ़ने की आशंका रहती है। भारत जैसे देश में, जहां पहले से ही टीबी का बोझ अधिक है, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है। हमें अपनी टीबी रणनीति में जलवायु लचीलापन (climate resilience) को भी शामिल करना होगा.
3. दवा प्रतिरोधी टीबी (DR-TB): इलाज अब हुआ आसान, लेकिन पहुंच अभी दूर
मल्टीड्रग-रेसिस्टेंट टीबी (MDR-TB) हमेशा से सबसे बड़ी चुनौती रही है। पुराने इलाज में मरीज को डेढ़ से दो साल तक रोज कई दवाएं लेनी पड़ती थीं, जिनके साइड इफेक्ट गंभीर होते थे .
अब विज्ञान ने बड़ी छलांग लगाई है। आईसीएमआर (ICMR) के अध्ययन के अनुसार, नए रेजिमेन—BPaL और BPaLM—सिर्फ 6 महीने में MDR-TB का इलाज कर सकते हैं, वो भी पूरी तरह से ओरल (गोलियों वाला) . यह न केवल ज्यादा असरदार है, बल्कि पुराने इलाज से किफायती भी है।
दिल्ली में पिछले साल दिसंबर से हजारों मरीजों को BPaLM रेजिमेन पर रखा गया है . यह बड़ी उपलब्धि है, लेकिन सवाल यह है कि देश के दूर-दराज के इलाकों में यह सुविधा कब तक पहुंचेगी? क्या हमारा स्वास्थ्य तंत्र इन नए रेजिमेन को राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू करने के लिए तैयार है?
4. मानसिक स्वास्थ और कलंक: अनदेखा पहलू
टीबी सिर्फ शारीरिक बीमारी नहीं है। दुनिया के विभिन्न समुदायों के अनुभव बताते हैं कि टीबी के इलाज का दर्द पीढ़ियों तक मानसिक आघात के रूप में बना रहता है . भारत में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। टीबी से जुड़ा कलंक (stigma) मरीजों को समय पर इलाज नहीं दिलवाता। कई मरीज नौकरी, परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा खोने के डर से अपनी बीमारी छिपाते हैं.
हमारे कार्यक्रमों में अब तक इस मानसिक पहलू पर गंभीरता से काम नहीं हुआ है। टीबी उन्मूलन के लिए जरूरी है कि हम टीबी से बचे लोगों (TB survivors) को न केवल पोषण सहायता दें, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक पुनर्वास पर भी ध्यान दें.
5. आपूर्ति श्रृंखला: एक नई चिंता
दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के कारण दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) प्रभावित हो सकती है। टीबी से जुड़े एक संगठन ने हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखकर चिंता जताई है कि MDR-TB की कुछ दवाएं सीमित संख्या में निर्माताओं पर निर्भर हैं .
अगर ये दवाएं बाधित हुईं, तो हजारों मरीजों का इलाज अधूरा रह सकता है, जिससे दवा प्रतिरोध और भी गंभीर हो सकता है . यह एक नई चुनौती है, जिसका सामना हमारी टीबी रणनीति को करना होगा। क्या हमारे पास पर्याप्त बफर स्टॉक है? क्या वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग तैयार हैं?
निष्कर्ष: नई सोच की जरूरत
विश्व टीबी दिवस सिर्फ जागरूकता का दिन नहीं है। यह आत्मचिंतन का दिन है। टीबी अब वह बीमारी नहीं रही जो सिर्फ गरीबी और भीड़भाड़ से जुड़ी थी। अब उसने नए रूप ले लिए हैं—एक्स्ट्रापल्मोनरी, दवा-प्रतिरोधी, जलवायु-प्रेरित।
हमारा दृष्टिकोण भी पुराने थूक-आधारित टेस्ट और लंबे इलाज के ढर्रे से बाहर निकलकर, आधुनिक तकनीक (खून-आधारित डायग्नोस्टिक्स), छोटे ओरल रेजिमेन (BPaL), मानसिक स्वास्थ्य सहायता और जलवायु लचीलेपन को केंद्र में रखने वाला होना चाहिए।
जैसा कि इस साल की थीम कहती है, ‘हाँ! हम टीबी खत्म कर सकते हैं!’ —लेकिन यह तभी संभव होगा, जब हम यह स्वीकार करें कि पुराने तरीके अब काफी नहीं हैं और बदलाव के लिए तैयार हों।
नोट: यह लेख विश्व टीबी दिवस 2026 के अवसर पर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोध, सरकारी रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है।
